धनबाद: सगीर हसन सिद्दीकी हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा काट रहे गैंगस्टर फहीम खान की रिहाई का रास्ता अब पूरी तरह साफ हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी है। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत मोहन और फहीम खान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत कुमार सिन्हा की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुनाया। अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश को सही मानते हुए सरकार की अपील को खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने 1984 की रिमिशन नीति लागू करने का दिया था आदेश

झारखंड हाईकोर्ट ने 7 नवंबर 2025 को फहीम खान की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर उन्हें रिहा करने का निर्देश दिया था। न्यायालय ने कहा था कि रिहाई समीक्षा बोर्ड ने वर्ष 2007 की संशोधित रिमिशन नीति के आधार पर रिहाई से इनकार किया, जबकि यह मामला वर्ष 1991 के फैसले से जुड़ा है। इसलिए इस पर वर्ष 1984 की रिमिशन नीति लागू होगी।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि सरकार निर्धारित अवधि में आदेश का पालन नहीं कर सकी, जिसके बाद फहीम खान ने अवमानना याचिका भी दायर की थी।

सुप्रीम कोर्ट में सरकार की अपील भी खारिज

हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ झारखंड सरकार ने 9 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की थी। हालांकि शीर्ष अदालत ने सरकार की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। इसके साथ ही फहीम खान की रिहाई की राह पूरी तरह साफ हो गई है। सरकार अब आगे के कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है।

क्या है पूरा मामला?

धनबाद के वासेपुर में 10 मई 1989 को सगीर हसन सिद्दीकी की हत्या हुई थी। इस मामले में वर्ष 2009 में झारखंड हाईकोर्ट ने फहीम खान को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। बाद में 21 अप्रैल 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा था।

अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद फहीम खान की रिहाई का मार्ग प्रशस्त हो गया है। यह फैसला झारखंड में रिमिशन नीति के तहत पुराने मामलों में लागू नियमों की व्याख्या के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


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