नवरात्रि या दुर्गा पूजा का त्यौहार जिस वजह से ख़ास माना जाता है, वह है स्त्री शक्ति या मातृ शक्ति की पूजा – अराधना. नौ दिनों तक लगभग पूरा देश मां दुर्गा की पूजा से जुड़े अनेकानेक अनुष्ठानों के माध्यम से नारी शक्ति की महत्ता को स्वीकार करता है, सिर नवाता है. कन्या पूजन के जरिये नारी शक्ति की श्रेष्ठता का मुक्तकंठ से उद्घोष करता है. पूरी दुनिया में हम अपनी संस्कृति और परम्परा की श्रेष्ठता का दावा करते हैं, यह कहकर कि हमारी मान्यता है कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता” यानि जहां नारियों की पूजा होती है, वहीं देवता निवास करते हैं. हमारे आध्यात्मिक आख्यानों में शक्ति – धन और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवियां हैं, देवता नहीं.
लेकिन क्या यह पूर्ण सत्य है? क्या वाकई हमारे आध्यात्मिक सिद्धांतों और आख्यानों के अनुरूप हमने नारी श्रेष्ठता के मानदंडों को सम्मान दिया है? या फिर हमारे पौराणिक सिद्धांत – आख्यान और हमारा आचरण परस्पर विपरीत है? यदि नहीं तो शक्ति की अधिष्ठात्री देवी की नारी स्वरुप में अराधना करनेवाले देश या समुदाय में स्त्रियों को अबला क्यों माना जाता है? नारी को देवी स्वरुप मानकर उसकी पूजा करनेवाले समुदाय में क्यों स्त्रियों को बराबरी का हक़ भी हासिल नहीं है?
भारत में महिलाओं की स्थिति अभी भी जटिल है, पारंपरिक पितृसत्तात्मक मानदंडों की चुनौतियां अब भी मौजूद हैं. हम यह बता कर खुश हो सकते हैं कि महिलायें अब उन पारंपरिक भूमिकाओं को भी अपना रही हैं जो उनके लिए वर्जित या असाध्य मानी जाती थी, जिनपर केवल पुरुषों का एकाधिकार माना जाता था. महिलायें अब सेना एवं अर्द्धसैनिक बलों में शामिल होकर शौर्य का प्रदर्शन कर रही हैं, ट्रेन और वायुयान चला रही हैं, खानों – खदानों में चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं का निर्वहन कर रही हैं, उद्यमी बनकर उद्योग – व्यापार के क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़ रही हैं, पूजा अराधना के दौरान पुरोहित की भूमिका निभा रही है, दुर्गा पूजा जैसे आयोजनों में ढाकी बजा रही हैं वगैरह – वगैरह. लेकिन क्या महिलाओं की ये सफलतायें और उपलब्धियां पुरुषों के प्रोत्साहन या समर्थन की वजह से संभव हो पायी हैं. शायद नहीं, ज्यादातर मामलों में महिलायें अपने अदम्य उत्साह, साहस, संघर्ष और जीजिविषा के बूते सफलता के सोपान या शिखर तक पहुंची हैं. ये उदाहरण निःसंदेह महिलाओं की शक्ति को दर्शाते हैं लेकिन साथ – साथ ये भी बताते हैं कि समाज को लैंगिक समानता और महिलाओं को सम्मान देने की दिशा में अभी और आगे बढ़ने की आवश्यकता है.
दिक्कत यह है कि महिलाओं के बारे में सोचने और बात करने का हमारा नजरिया एकांगी और पूर्वाग्रह से ग्रसित है. यही कारण है कि हम महिलाओं की वास्तविक जरूरतों और आकांक्षाओं को समझ ही नहीं पाते, उनके साथ अन्याय की परम्परा को अनवरत आगे बढ़ाते रहते हैं. स्त्री को देवी बताकर पूजने का सिद्धांत और बराबरी के हक़ से भी वंचित रखने का हमारा व्यवहार पुरुष समुदाय की हिप्पोक्रेसी का शायद सबसे बड़ा उदाहरण है.
दुर्गा पूजा के दौरान हम नारी को शक्ति स्वरूपा मानकर पूजा करते हैं लेकिन उसी दुर्गा पूजा में महिलाओं की सहभागिता वर्जित हो जाती है यदि वह रजस्वला हो यानि उसका पीरियड चल रहा हो. कन्या पूजा के दौरान भी हम अनिवार्य तौर पर यह ध्यान रखते हैं कि पूजी जानेवाली कन्याओं में से कोई भी ऐसी नहीं हो जिसका मासिक धर्म शुरू हो गया हो. लेकिन दूसरी तरफ हम असम के कामाख्या देवी मन्दिर में देवी सती के मासिक धर्म यानि रजस्वला अवस्था को शक्ति के रूप में पूजते हैं. कामाख्या मंदिर में स्त्री जननांग को स्त्रीत्व, सृजन शक्ति और प्रजनन शक्ति का प्रतीक मानकर देवी की योनि के आकार की शिला को पूजते हैं. हर साल आषाढ़ महीने में अम्बुबाची मेले के दौरान देवी कामाख्या को रजस्वला मानकर तीन दिनों के लिए मन्दिर बंद रखा जाता है और तीन दिनों के बाद विशेष अनुष्ठान के उपरान्त देवी के रजस्वला वस्त्र भक्तों को प्रसाद स्वरुप दिए जाते हैं. सारांश यह कि एक तरफ तो हम देवी के रजस्वला स्वरुप को पूज्य मानते हैं, दूसरी तरफ रजस्वला स्त्रियों या बालिकाओं को देवी की पूजा अर्चना से रोकते हैं. हमारे दोहरे आचरण का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है?
विकसित हो रही दुनिया में भी महिलाएं शिक्षा से वंचित होने, गरीबी, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, आर्थिक अवसरों की असमानता, राजनीतिक नेतृत्व में कम प्रतिनिधित्व और हिंसा जैसी कई महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रही हैं. दुनिया भर में लाखों लड़कियां और महिलायें अभी भी शिक्षा से वंचित हैं, जिससे उनके विकास में बाधा आती है. महिलाओं को आर्थिक अवसरों, वित्तीय संसाधनों और बैंकिंग सेवाओं तक सीमित पहुंच का सामना करना पड़ता है, जिससे वे गरीबी से बाहर नहीं निकल पातीं. महिलाओं को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं, विशेष रूप से स्त्री विशिष्ट स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान सम्बन्धी सेवाओं तक पहुंचने में कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जो उनके जीवन को प्रभावित करता है. महिलाओं को समान काम के लिए समान वेतन नहीं मिलता है, उन्हें नेतृत्व की भूमिकाओं में कम प्रतिनिधित्व मिलता है, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न एक बड़ी चुनौती है. परिवार और समाज में लैंगिक रुढ़ियां महिलाओं को परिवार और काम के बीच संतुलन बनाने से रोकती हैं, कई बार उन्हें घर और परिवार को ही प्राथमिकता देने के लिए मजबूर किया जाता है. हर 10 मिनट में एक महिला अपने साथी या किसी परिचित व्यक्ति द्वारा अपनी जान गंवा रही है, जो एक गंभीर चुनौती है. भेदभावपूर्ण नीतियां और सामाजिक मानदंड महिलाओं को ज़मीन और घर जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों तक पहुंचने से रोकते हैं.
अबतक जिन विषयों का जिक्र हुआ, उनपर तो गाहे – बगाहे चर्चा हो भी जाती है लेकिन आगे मैं एक विषय का उल्लेख करूंगा, जिसपर चर्चा होती ही नहीं लेकिन वह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है. पुरुष यह तो मानता है कि महिलाओं का शरीर विशिष्ट होता है और यही पुरुषों का महिलाओं के प्रति आकर्षण का कारण भी है. लेकिन महिला शरीर के प्रति पुरुषों के आकर्षण ने उनकी सोच को पूर्वाग्रह ग्रसित बना दिया है, इसपर कभी गौर किया ही नहीं गया. पुरुष ने महिला शरीर के बारे में जब भी विचार किया, अपनी यौन आकांक्षाओं या यूं कहें कि यौन विकारों के हिसाब से किया. पुरुषों से अलग और विशिष्ट संरचना वाली देह धारण करनेवाली स्त्रियों की स्वास्थ्य समस्यायें और उनके निदान भी विशिष्ट होने चाहिए, इसपर कभी विचार किया ही नहीं गया.
स्वास्थ्य एवं चिकित्सा अनुसंधान में महिलाओं की ज़रूरतों की उपेक्षा का मुख्य कारण महिला शरीर-क्रिया विज्ञान की सीमित समझ और नैदानिक अध्ययनों में महिलाओं को शामिल न करना है, जिससे हृदय रोग और कैंसर जैसी कई बीमारियां महिलाओं में अलग तरह से विकसित होती हैं. इस उपेक्षा के कारण दवाओं के प्रतिकूल प्रभाव का खतरा बढ़ जाता है और महिला-विशिष्ट बीमारियों के लिए कम प्रभावी उपचार उपलब्ध होते हैं.
इस बात पर पर्याप्त शोध हुआ ही नहीं है कि महिलाओं का शरीर पुरुषों की तरह नहीं बल्कि अलग तरीके से काम करता है. इस वजह से ऐसे हेल्थ इश्यूज जो सिर्फ महिलाओं में होती है, उनके इलाज और इलाज के क्रम में महिला शरीर के रिएक्शन को समझा ही नहीं गया है. महिला विषयों को नैदानिक अध्ययनों यानि क्लिनिकल ट्रायल से बाहर रखा गया है, जिसके कारण महिला-विशिष्ट बीमारियों पर पर्याप्त ज्ञान उपलब्ध है ही नहीं. 1993 से पहले, महिलाओं को क्लिनिकल ट्रायल में शायद ही कभी शामिल किया जाता था. आज भी, चिकित्सा क्षेत्र को यह पता नहीं है कि कई दवायें और उपकरण महिलाओं के लिए कितने कारगर हैं. चिकित्सा अनुसंधान में लिंग के आधार पर शारीरिक संरचना में होने वाले बुनियादी अंतरों को अनदेखा किया जाता है, जबकि यह अंतर एलोपैथी यानि रोग विकृति विज्ञान और उपचार यानि ट्रीटमेंट के प्रति प्रतिक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
एंडोमेट्रियोसिस और रजोनिवृत्ति यानि मेनोपौज से लेकर हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं तक, महिलाओं को कई जटिल और अलग तरह की स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिनपर अभी तक पर्याप्त और स्वतंत्र शोध हुआ ही नहीं है. पर्याप्त शोध की कमी के कारण, महिला-विशिष्ट जैविक अंतरों को ध्यान में नहीं रखा जाता है, जिससे कुछ दवाओं के प्रति महिलाओं में प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं का खतरा 3.5 गुना तक बढ़ जाता है. महिला-विशिष्ट लक्षणों और बीमारियों की समझ में कमी के कारण, महिलाओं का गलत निदान हो सकता है या उन्हें कम प्रभावी उपचार मिल सकते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य परिणामों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 2013 के एक अध्ययन में पाया गया कि मेटल हिप ट्रांसप्लांट के क्रम में महिलाओं में पुरुषों की तुलना में प्रत्यारोपण विफलता की संभावना 29% अधिक थी और माना गया कि इसकी वजह संभवतः महिलाओं में शारीरिक अंतर और अपर्याप्त परीक्षण है. संयुक्त राज्य अमेरिका में पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए हृदय रोग मृत्यु का प्रमुख कारण होने के बावजूद, चिकित्सा क्षेत्र ने केवल तभी माना कि महिलाओं को पुरुषों की तुलना में रोग के भिन्न लक्षणों का अनुभव होता है जब अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन ने 1999 में महिलाओं के लिए निवारक कार्डियोलॉजी के लिए एक गाइड प्रकाशित किया था.
दरअसल महिलाओं को पूजने की बात करनेवाले हमारे पितृसत्तात्मक समाज के हर क्षेत्र में पुरुषों की वर्चस्ववादी मानसिकता काम कर रही है. कुछ अपवादों को छोड़कर नीति निर्धारक और अनुपालक राजनैतिक – प्रशासनिक – न्यायिक नेतृत्व पर पुरुषों का एकाधिकार है. मीडिया में भी महिलाओं के लिए मौके बस सजावट के तौर पर हैं, महिलाओं से सम्बंधित जटिल मुद्दों को या तो गोपन के योग्य माना जाता है या वर्जित या फिर तुच्छ. इन मुद्दों पर चर्चा होती नहीं, होती है तो नकारात्मक तरीके से या फिर भारी झिझक के साथ.
मेरे हिसाब से हालात बेहतर हो सकते हैं. ज्यादा कुछ करने की जरुरत भी नहीं. हमारा समाज स्त्री को या तो देवी मानता है या अबला, बराबरी की गुंजाईश को कुटिलता के साथ खारिज कर देता है. इलाज ये है कि स्त्री को देवी मानने का आडम्बर करने की बजाय स्त्री को वास्तविक अर्थों में उसके अधिकार दे दीजिये. देवी की बजाय स्त्री को साथी – सहचरी मानिये. यकीन जानिये, मां भगवती भी प्रसन्न होंगी, आपकी दुर्गा पूजा सार्थक होगी.

