पटना : बिहार विधान परिषद चुनाव को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने अपने सभी नौ उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद पंचायती राज मंत्री और राष्ट्रीय लोक मोर्चा प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश को टिकट नहीं मिलने से राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। दीपक प्रकाश फिलहाल किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं, ऐसे में उनके मंत्री पद को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

विधान परिषद चुनाव में नहीं मिला मौका

बिहार विधानसभा कोटे से विधान परिषद की 10 सीटों पर चुनाव होना है। इनमें नौ सीटों पर नियमित द्विवार्षिक चुनाव हो रहा है, जबकि एक सीट मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद रिक्त हुई थी।

विधानसभा में मौजूदा संख्या बल को देखते हुए 10 में से 9 सीटों पर एनडीए की जीत लगभग तय मानी जा रही है, जबकि एक सीट महागठबंधन के खाते में जाने की संभावना जताई जा रही है। एनडीए ने अपने सभी नौ उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं, जिससे गठबंधन के भीतर अतिरिक्त सीट की संभावनाएं लगभग समाप्त हो गई हैं।

छह महीने में सदन का सदस्य बनना जरूरी

संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार कोई व्यक्ति बिना विधायक या विधान पार्षद बने मंत्री नियुक्त किया जा सकता है, लेकिन उसे छह महीने के भीतर किसी एक सदन का सदस्य बनना अनिवार्य होता है।

दीपक प्रकाश पहले भी मंत्री रह चुके हैं। बाद में मई 2026 में उन्हें राष्ट्रीय लोक मोर्चा कोटे से दोबारा मंत्री बनाया गया था। उस समय से ही यह माना जा रहा था कि उन्हें विधान परिषद चुनाव में उम्मीदवार बनाया जाएगा, लेकिन उम्मीदवारों की सूची में उनका नाम शामिल नहीं किया गया।

मंत्री पद पर बना रहना चुनौतीपूर्ण

नियमों के अनुसार यदि दीपक प्रकाश निर्धारित समय सीमा के भीतर किसी सदन की सदस्यता हासिल नहीं कर पाते हैं तो उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है। मौजूदा स्थिति में उन्हें 7 नवंबर 2026 से पहले किसी सदन का सदस्य बनना होगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल ऐसा कोई स्पष्ट चुनावी अवसर नजर नहीं आ रहा है, जिसके माध्यम से वे जल्द सदन तक पहुंच सकें। यही कारण है कि उनके राजनीतिक भविष्य और मंत्री पद को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

उपेन्द्र कुशवाहा ने जताई उम्मीद

दीपक प्रकाश की उम्मीदवारी को लेकर उठ रहे सवालों पर उपेन्द्र कुशवाहा ने कहा है कि उनकी एनडीए के वरिष्ठ नेताओं से बातचीत जारी है। उन्होंने कहा कि नामांकन प्रक्रिया पूरी होने में अभी समय है, इसलिए अंतिम स्थिति स्पष्ट होने तक इंतजार किया जाना चाहिए।

उनके इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में अटकलें बनी हुई हैं कि आने वाले दिनों में कोई नया राजनीतिक समीकरण भी सामने आ सकता है।

विधानसभा का गणित भी नहीं दे रहा राहत

विधान परिषद चुनाव में जीत के लिए एक उम्मीदवार को लगभग 25 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होती है। एनडीए के पास वर्तमान में 201 विधायक हैं, जिसके आधार पर गठबंधन अपने नौ उम्मीदवारों को आसानी से जिता सकता है।

वहीं राष्ट्रीय लोक मोर्चा के पास केवल चार विधायक हैं। इसके मुकाबले हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के पास पांच और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के पास 19 विधायक हैं। ऐसे में सीटों के बंटवारे के दौरान राष्ट्रीय लोक मोर्चा की दावेदारी अपेक्षाकृत कमजोर पड़ती दिखाई दी।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि दीपक प्रकाश को सदन तक पहुंचाने के लिए गठबंधन कोई नया रास्ता निकालता है या नहीं।

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