रांची: झारखंड में बढ़ते जल संकट का स्थायी समाधान राज्य की भूगर्भीय संरचना (जियोलॉजी) को समझे बिना संभव नहीं है। यह बात प्रख्यात भूवैज्ञानिक डॉ. नीतीश प्रियदर्शी ने गुरुवार को एक्सआईएसएस में आयोजित इंडिया रूरल कोलोक 2026 के दौरान कही। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक शोध और स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों के अनुरूप योजना बनाए बिना जल संरक्षण से जुड़ी कोई भी परियोजना सफल नहीं हो सकती।
जियोलॉजी को समझे बिना सफल नहीं होगी जल संरक्षण की योजना
डॉ. प्रियदर्शी ने कहा कि अब समय आ गया है कि झारखंड की जियोलॉजी का नए सिरे से अध्ययन किया जाए। उन्होंने कहा कि राज्य की मिट्टी की गुणवत्ता, भूजल रिचार्ज जोन, चट्टानों की संरचना और सतही बनावट को समझे बिना वाटरशेड प्रबंधन और भूजल रिचार्ज की योजनाएं प्रभावी नहीं हो सकतीं।
उन्होंने कहा कि झारखंड में जल संकट से निपटने के लिए पहले वैज्ञानिक शोध करना होगा, उसके बाद उसी के अनुरूप कार्ययोजना तैयार करनी होगी।
1400 मिमी बारिश के बावजूद रांची में जल संकट
डॉ. प्रियदर्शी ने बताया कि रांची में औसतन 1400 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा होती है, लेकिन इसके बावजूद शहर जल संकट का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण जमीन का बड़ा हिस्सा कंक्रीट से ढक गया है, जिससे वर्षा का 40 से 50 प्रतिशत पानी बहकर निकल जाता है और भूजल का पर्याप्त पुनर्भरण नहीं हो पाता।
तालाबों की सफाई और नदी संरक्षण पर दिया जोर
उन्होंने कहा कि रांची के अधिकांश तालाबों की लंबे समय से सफाई नहीं हुई है, जिसके कारण वे उथले हो गए हैं और उनकी जल संचयन क्षमता लगातार घट रही है। इसके अलावा नदियों पर बढ़ते अतिक्रमण से जल प्रवाह भी प्रभावित हो रहा है।
डॉ. प्रियदर्शी ने कहा कि रांची पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण वर्षा का पानी तेजी से बह जाता है। यदि इस पानी को पहाड़ों से नीचे आने के दौरान रोककर उसका संचयन किया जाए और वैज्ञानिक तरीके से भूजल रिचार्ज किया जाए, तो जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
स्थानीय समुदाय की भागीदारी जरूरी
उन्होंने कहा कि जल संरक्षण की किसी भी योजना को सफल बनाने के लिए स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। रिचार्ज जोन की पहचान, वर्षा जल संचयन और प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण पर सामूहिक प्रयास किए जाने चाहिए, तभी झारखंड में भूजल संकट का स्थायी समाधान संभव होगा।

