रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने बालू घाटों के खनन पट्टे और राज्य सरकार की बदलती नीतियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरकार किसी कंपनी से खनन पट्टे की राशि लेने के बाद उसे खनन कार्य से वंचित नहीं कर सकती और न ही उसकी जमा राशि को अपने पास रोककर रख सकती है।

मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने निर्देश दिया कि जिस अवधि में प्रार्थी कंपनी खनन कार्य नहीं कर सकी, उस अवधि की टेंडर राशि उसे हर हाल में वापस की जाए।

कंपनी को मिलेगा मूलधन के साथ ब्याज

अदालत ने प्रार्थी कंपनी ‘गॉडफैम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड’ के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को मूलधन के साथ 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज देने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने कहा कि ब्याज की गणना 15 अक्टूबर 2012 से की जाएगी, जब कंपनी ने औपचारिक रूप से बालू घाटों को सरकार के हवाले कर दिया था। यह ब्याज वास्तविक भुगतान की तिथि तक देय होगा।

सरकार की नीतिगत गलती का बोझ कंपनी पर नहीं

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि वर्ष 2011 में जब कंपनी को खनन पट्टा दिया गया था, तब पर्यावरणीय स्वीकृति की कोई अनिवार्य शर्त नहीं थी। बाद में सरकार ने नई शर्त लागू कर दी और उसके आधार पर कंपनी का ट्रांजिट चालान जारी करना बंद कर दिया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार अपनी नीतिगत गलतियों का आर्थिक भार किसी पट्टाधारी कंपनी पर नहीं डाल सकती। यदि सरकार ने बीच में नियम बदले हैं तो उसका खामियाजा कंपनी को नहीं भुगतना चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि कंपनी के सामने केवल दो विकल्प थे—या तो पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त करे या फिर घाट वापस कर दे। कंपनी ने घाट सरेंडर करने का निर्णय लिया, इसलिए वह राशि वापसी की हकदार है।

हालांकि अदालत ने रॉयल्टी, पंजीकरण शुल्क और स्टांप शुल्क की वापसी को लेकर कोई नया निर्देश जारी नहीं किया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला लगभग 14 से 15 वर्ष पुराना है। वर्ष 2011 में गॉडफैम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड ने धनबाद जिले के पांच बालू घाटों के लिए वर्ष 2011 से 2014 तक की अवधि का खनन अधिकार प्राप्त किया था। कंपनी ने निर्धारित बोली राशि भी सरकारी खजाने में जमा कर दी थी।

लेकिन जून 2012 में राज्य सरकार ने नया नियम लागू करते हुए कंपनी का ट्रांजिट चालान जारी करना बंद कर दिया। सरकार का तर्क था कि कंपनी के पास पर्यावरणीय स्वीकृति नहीं है।

कंपनी ने इसका विरोध करते हुए अदालत का रुख किया और कहा कि नीलामी सूचना या खनन समझौते में ऐसी किसी शर्त का उल्लेख नहीं था। खनन कार्य बंद होने के बाद कंपनी ने 15 अक्टूबर 2012 को अपने सभी पांच बालू घाट सरकार को वापस सौंप दिए थे।

लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अब हाईकोर्ट ने कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राशि ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया है।

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