रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग जिले के केरेडारी प्रखंड स्थित पांडु गांव की जमीन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्षों से चली आ रही जमाबंदी को राजस्व अधिकारी केवल प्रशासनिक आदेश के आधार पर रद्द नहीं कर सकते। यदि राज्य सरकार को किसी जमाबंदी या भूमि बंदोबस्ती की वैधता पर संदेह है, तो उसे अपने अधिकार और स्वामित्व के निर्धारण के लिए सक्षम सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा।

हजारीबाग उपायुक्त का आदेश रद्द

जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने हजारीबाग के तत्कालीन उपायुक्त द्वारा 23 अप्रैल 2017 को पारित जमाबंदी रद्द करने के आदेश को निरस्त कर दिया। हालांकि अदालत ने राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी कि यदि वह संबंधित भूमि पर अपना दावा स्थापित करना चाहती है, तो विधि के अनुसार सक्षम सिविल कोर्ट में वाद दायर कर सकती है।

पुराने फैसले का दिया हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पूर्व के महत्वपूर्ण निर्णय ‘राज्य बनाम इजहार हुसैन’ का उल्लेख करते हुए कहा कि लंबे समय से प्रभावी जमाबंदी समाप्त करने का अधिकार राजस्व अधिकारियों के पास नहीं है। अदालत ने दोहराया कि भूमि के स्वामित्व और अधिकार का अंतिम निर्धारण केवल सिविल कोर्ट ही कर सकता है।

अदालत ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर कि रजिस्टर में जमाबंदी खोलने का आदेश उपलब्ध नहीं है, भूमि रिटर्न नहीं मिला है या अन्य प्रशासनिक संदेह हैं, लगभग 60 वर्षों से चली आ रही जमाबंदी को रद्द नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में विधिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।

1955 से चल रही थी जमाबंदी

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अभिजीत कुमार सिंह और अधिवक्ता हर्ष चंद्र ने अदालत को बताया कि विवादित भूमि का बंदोबस्त तत्कालीन जमींदार द्वारा हुकुमनामा के माध्यम से किया गया था। वर्ष 1955 से संबंधित भूमि की जमाबंदी याचिकाकर्ताओं के नाम पर नियमित रूप से चल रही थी। साथ ही वे लगातार सरकारी लगान का भुगतान भी करते रहे हैं।

एनटीपीसी अधिग्रहण के समय भी माना गया था वैध दावेदार

सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि वर्ष 2013 में एनटीपीसी द्वारा भूमि अधिग्रहण के दौरान अपर समाहर्ता ने विस्तृत जांच के बाद याचिकाकर्ताओं को मुआवजा प्राप्त करने का वैध दावेदार माना था। जांच के बाद उन्हें भूमि का वास्तविक अधिकारधारी स्वीकार करते हुए मुआवजा देने की प्रक्रिया अपनाई गई थी।

राजस्व अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर हुई थी कार्रवाई

मामले में अंचलाधिकारी की जांच रिपोर्ट में कहा गया था कि रजिस्टर-दो में जमाबंदी खोलने के आदेश का उल्लेख उपलब्ध नहीं है। साथ ही भूमि रिटर्न दाखिल नहीं किए जाने और मौके पर कब्जा नहीं मिलने की बात कही गई थी। इन्हीं आधारों पर तत्कालीन उपायुक्त ने 23 अप्रैल 2017 को जमाबंदी रद्द करने का आदेश जारी किया था, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

राज्य सरकार ने उठाए थे सवाल

राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि संबंधित बंदोबस्ती संदेहास्पद है। सरकार का कहना था कि बंदोबस्ती के समय याचिकाकर्ता की उम्र महज चार से पांच वर्ष थी और जमाबंदी खोलने से संबंधित कोई आदेश रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है। हालांकि हाईकोर्ट ने माना कि केवल ऐसे संदेहों के आधार पर दशकों पुरानी जमाबंदी समाप्त नहीं की जा सकती।

याचिकाकर्ताओं को मिली राहत

मो. जाहिद मियां और मो. शमीम मियां द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने उपायुक्त का आदेश निरस्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि झारखंड में लंबे समय से चली आ रही जमाबंदियों को प्रशासनिक स्तर पर समाप्त नहीं किया जा सकता और ऐसे विवादों का अंतिम समाधान केवल सक्षम सिविल कोर्ट के माध्यम से ही संभव है।

फैसले का व्यापक असर

हाईकोर्ट का यह निर्णय झारखंड में भूमि विवाद और जमाबंदी से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि दशकों पुरानी जमाबंदी को केवल प्रशासनिक संदेह के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता और भूमि स्वामित्व से जुड़े विवादों का निपटारा न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।

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