सरायकेला: सरायकेला-खरसावां जिले के गीतिलोता स्थित शिव मंदिर में रज संक्रांति के अवसर पर आस्था, परंपरा और हठभक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। सोमवार को सैकड़ों शिव भक्तों ने दहकते अंगारों पर नंगे पांव चलकर भगवान शिव के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा और विश्वास का परिचय दिया। चिलचिलाती धूप और गर्म हवाओं के बीच आयोजित इस धार्मिक अनुष्ठान ने हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित किया।

दहकते अंगारों पर चलकर जताई श्रद्धा

रविवार से व्रत रखकर शिव आराधना में जुटे भक्तों ने सोमवार सुबह मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना की। इसके बाद सूखी लकड़ियों को जलाकर अंगार तैयार किए गए। दोपहर करीब एक बजे ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच शिव भक्त नंगे पांव जलते अंगारों पर चले और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की प्रार्थना की।

श्रद्धालुओं का मानना है कि भगवान शिव के प्रति अटूट विश्वास ही उन्हें इस कठिन अनुष्ठान को पूरा करने की शक्ति प्रदान करता है। अंगारों पर चलने के बाद भक्तों ने मंदिर में जलाभिषेक कर पूजा-अर्चना की।

युवाओं ने भी बढ़-चढ़कर लिया हिस्सा

इस पारंपरिक धार्मिक आयोजन में युवाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। बड़ी संख्या में युवा भक्तों ने अंगारों पर चलकर अपनी आस्था व्यक्त की और धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा बने। पूरे आयोजन के दौरान मंदिर परिसर भक्तिमय माहौल में डूबा रहा और भोलेनाथ के जयकारों से वातावरण गूंजता रहा।

शरीर को कष्ट, मन को मिलता है सुकून

हठभक्ति में शामिल श्रद्धालुओं का कहना है कि यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक शांति प्राप्त करने का माध्यम है। उनका विश्वास है कि भगवान शिव की कृपा से आग पर चलने के बावजूद किसी प्रकार का गंभीर नुकसान नहीं होता। भक्तों के अनुसार वर्षों से यह परंपरा निभाई जा रही है और आज तक किसी श्रद्धालु को गंभीर चोट या जलन की समस्या नहीं हुई है।

140 वर्षों से जीवित है यह परंपरा

स्थानीय लोगों के अनुसार गीतिलोता शिव मंदिर में अंगारों पर चलने की यह परंपरा लगभग 140 वर्षों से भी अधिक पुरानी है। हर वर्ष रज संक्रांति के अवसर पर श्रद्धालु इस अनुष्ठान में भाग लेते हैं और भगवान शिव के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त करते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।

हजारों श्रद्धालुओं ने देखा अनोखा धार्मिक अनुष्ठान

इस विशेष आयोजन को देखने के लिए दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर पहुंचे। रविवार शाम से ही श्रद्धालुओं का जुटना शुरू हो गया था। पूरे आयोजन के दौरान मंदिर परिसर और आसपास का इलाका धार्मिक उल्लास और भक्ति भाव से सराबोर रहा। लोगों ने इस अनूठी परंपरा को क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का प्रतीक बताया।

Share.
Leave A Reply

Exit mobile version