रांची : रांची के चर्चित अंकुश शर्मा हत्याकांड में अदालत ने अहम फैसला सुनाते हुए दो आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा। विशेष रूप से वह सीसीटीवी फुटेज, जिसे पुलिस जांच का महत्वपूर्ण आधार बता रही थी, सुनवाई के दौरान कोर्ट में पेश नहीं किया जा सका।

सीसीटीवी फुटेज नहीं पेश कर सकी पुलिस

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने जांच अधिकारी से उस सीसीटीवी फुटेज को प्रस्तुत करने को कहा, जिसके आधार पर आरोपियों की संलिप्तता का दावा किया गया था। हालांकि पुलिस संबंधित फुटेज कोर्ट में उपलब्ध नहीं करा सकी।

अदालत ने अपने फैसले में माना कि जब जांच एजेंसी अपने प्रमुख साक्ष्य को ही प्रस्तुत नहीं कर पाती है, तो अभियोजन पक्ष के आरोप कमजोर पड़ जाते हैं। ऐसे में आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो सके।

जांच के आधार पर बनाए गए थे आरोपी

अंकुश शर्मा हत्याकांड की जांच के दौरान पुलिस ने कई लोगों को आरोपी बनाया था। जांच एजेंसी का दावा था कि आरोपियों की गतिविधियां सीसीटीवी कैमरों में दर्ज हुई थीं और उसी के आधार पर उनकी भूमिका सामने आई थी।

लेकिन अदालत में जब इस दावे को प्रमाणित करने की बारी आई, तो संबंधित तकनीकी साक्ष्य पेश नहीं किए जा सके। इससे अभियोजन पक्ष की दलीलों को मजबूती नहीं मिल सकी।

संदेह का लाभ देकर किया गया बरी

भारतीय न्याय प्रणाली के अनुसार किसी भी आरोपी को तभी दोषी ठहराया जा सकता है, जब उसके खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित हो जाएं। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त नहीं हैं और दोष सिद्ध करने के लिए जरूरी कानूनी मानकों को पूरा नहीं करते।

इसी आधार पर कोर्ट ने दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का आदेश दिया।

अन्य पहलुओं पर जारी रहेगी कानूनी प्रक्रिया

अदालत के इस फैसले का असर केवल उन दो आरोपियों तक सीमित है, जिन्हें बरी किया गया है। हत्याकांड से जुड़े अन्य आरोपियों और मामले के अन्य पहलुओं पर कानूनी प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी।

इस फैसले के बाद जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और साक्ष्य संरक्षण को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि गंभीर आपराधिक मामलों में तकनीकी और वैज्ञानिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखना तथा समय पर अदालत में प्रस्तुत करना बेहद महत्वपूर्ण होता है। कई मामलों में ऐसे साक्ष्यों की अनुपस्थिति मुकदमे की दिशा और परिणाम दोनों को प्रभावित कर सकती है।

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