पलामू : झारखंड के पलामू जिले का मनातू प्रखंड, जो कभी अति नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में जाना जाता था, अब आजीविका और वन संरक्षण का सफल मॉडल बनकर उभर रहा है। यहां वन विभाग की पहल पर गठित वन समिति के सहयोग से ग्रामीण पलाश के पेड़ों पर लाह की खेती कर हर वर्ष लाखों रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं।
वन विभाग की देखरेख में सेवती के जंगलों में वर्तमान में लगभग 300 पलाश के पेड़ों पर लाह का उत्पादन किया जा रहा है। इससे वन समिति को प्रतिवर्ष करीब 12 लाख रुपये की आमदनी हो रही है। इस पहल से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलने के साथ-साथ जंगलों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो रहा है।
पेड़ काटने पर जुर्माना, सूचना देने वाले को इनाम
वनों की सुरक्षा के लिए वन समिति ने सख्त नियम बनाए हैं। यदि कोई व्यक्ति पेड़ काटते हुए पकड़ा जाता है तो उससे प्रति पेड़ 200 रुपये का जुर्माना वसूला जाता है। वहीं, अवैध कटाई की सूचना देने वाले व्यक्ति को समिति की ओर से 100 रुपये का प्रोत्साहन दिया जाता है।
समिति के सदस्यों के लिए भी कड़े नियम लागू हैं। यदि कोई सदस्य स्वयं पेड़ काटते हुए पकड़ा जाता है तो उस पर आर्थिक दंड लगाने के साथ उसकी सदस्यता तत्काल समाप्त कर दी जाती है और भविष्य में दोबारा सदस्य बनने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया जाता है।
साल में दो बार होती है लाह की खेती
वन समिति के अध्यक्ष सुरेंद्र पासवान ने बताया कि सेवती, सरईडीह और सिकनी क्षेत्र में बड़ी संख्या में पलाश के पेड़ हैं, जिन पर वर्ष में दो बार लाह की खेती की जाती है।
उन्होंने बताया कि फरवरी में पेड़ों की टहनियों की छंटाई की जाती है और मार्च में लाह का बीज चढ़ाया जाता है, जिसकी फसल अक्टूबर में तैयार होती है। दूसरी फसल के लिए नवंबर में बीज चढ़ाया जाता है और फरवरी में लाह की कटाई की जाती है।
एक पेड़ से 10 किलो लाह का उत्पादन
वन समिति के अनुसार, एक पलाश के पेड़ से औसतन 10 किलोग्राम लाह प्राप्त होता है। बाजार में इसकी कीमत लगभग 200 रुपये प्रति किलोग्राम है। इस प्रकार 300 पेड़ों से सालाना करीब छह हजार किलोग्राम लाह का उत्पादन होता है, जिससे लगभग 12 लाख रुपये की आय होती है।
अगले वर्ष बैर के पेड़ों पर होगी रंगीन लाह की खेती
वन समिति ने अगले वर्ष से बैर के पेड़ों पर भी लाह की खेती शुरू करने की योजना बनाई है। बैर के पेड़ों से रंगीन और सामान्य दोनों प्रकार की लाह प्राप्त होती है। रंगीन लाह की बाजार में काफी अधिक मांग है और इसकी कीमत लगभग 1,500 से 2,000 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिलती है।
जंगलों को समृद्ध बनाने की भी पहल
समिति केवल लाह उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि जंगलों को समृद्ध बनाने के लिए आंवला, इमली, पीपल, बरगद, जामुन, महुआ, बांस और जंगल जलेबी जैसे पौधे भी तैयार किए जा रहे हैं। बारिश के मौसम में इन्हें जंगल की खाली भूमि पर लगाया जाएगा।
डीएफओ बोले- जंगल बचेंगे तो रोजगार भी मिलेगा
सत्यम कुमार ने कहा कि दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को जंगलों के संरक्षण के प्रति जागरूक करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि मनातू जैसे क्षेत्रों में लोगों को वन संरक्षण से जोड़ने का सकारात्मक परिणाम सामने आया है। इससे जंगल सुरक्षित हो रहे हैं, स्थानीय लोगों को रोजगार मिल रहा है और उन्हें काम की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन भी नहीं करना पड़ रहा है।

