Garhwa : गढ़वा जिले में डंडा प्रखंड सह अंचल और मंझिआंव नगर पंचायत की मान्यता समाप्त किए जाने की संभावनाओं को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चिंता बढ़ती जा रही है। इस मुद्दे पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय महासचिव मिथिलेश कुमार ठाकुर ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर दोनों प्रशासनिक इकाइयों की मान्यता यथावत बनाए रखने की मांग की है।
मिथिलेश ठाकुर ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि गढ़वा जिला आज़ादी के बाद से ही स्वतंत्र अस्तित्व की लड़ाई लड़ता रहा है और 1991 में इसे पलामू से अलग कर जिला बनाया गया। झारखंड राज्य गठन के बाद प्रशासनिक सुविधा, भौगोलिक स्थिति और जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए प्रखंडों का पुनर्गठन किया गया। इसी क्रम में वर्ष 2008 में डंडा प्रखंड का गठन हुआ, ताकि क्षेत्र की जनता को प्रशासनिक सेवाएं उनके नजदीक मिल सकें। डंडा प्रखंड का उद्घाटन दिशोम गुरु शिबू सोरेन के मुख्यमंत्री कार्यकाल में हुआ था, जिससे इसका ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व भी जुड़ा हुआ है।
पत्र में बताया गया है कि डंडा प्रखंड मुख्यालय गढ़वा जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित है और यहां आदिवासी, पिछड़ा वर्ग, किसान, मजदूर और दलित समुदाय की बड़ी आबादी निवास करती है। प्रखंड और अंचल कार्यालय भूमि संबंधी कार्य, आय-जाति-निवास प्रमाण पत्र, पेंशन, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र जैसी आवश्यक सेवाओं के लिए स्थानीय जनता का मुख्य सहारा हैं। यदि डंडा प्रखंड की मान्यता समाप्त की जाती है, तो आम नागरिकों को दूर-दराज के कार्यालयों पर निर्भर रहना पड़ेगा, जिससे समय, धन और श्रम की भारी क्षति होगी।
मिथिलेश ठाकुर ने प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी डंडा प्रखंड को समाप्त करने के प्रस्ताव को अव्यावहारिक बताया। उन्होंने कहा कि क्षेत्र की जनसंख्या, भौगोलिक दूरी और सामाजिक परिस्थितियां इस प्रखंड के अस्तित्व को पूरी तरह उचित ठहराती हैं। ऐसे में इसे समाप्त करना जनहित के विरुद्ध होगा।
पत्र में मंझिआंव नगर पंचायत का भी जिक्र किया गया है। बताया गया कि इसका गठन वर्ष 2010 में हुआ था, जिसमें तीन ग्राम पंचायतों को शामिल किया गया। वर्तमान में नगर पंचायत क्षेत्र में 12 वार्ड और 21 गांव आते हैं। नगर पंचायत से राज्य सरकार को कर और अन्य स्रोतों से नियमित राजस्व भी प्राप्त होता है। इसके बावजूद जिला प्रशासन द्वारा डंडा प्रखंड सह अंचल और मंझिआंव नगर पंचायत की मान्यता समाप्त करने संबंधी पत्र मुख्य सचिव को भेजा जाना दुर्भाग्यपूर्ण और जनविरोधी कदम बताया गया है।
