चाईबासा: पश्चिमी सिंहभूम जिले के मंझारी प्रखंड स्थित बड़ा लगड़ा गांव में मौजूद एक पुराना पक्का मकान आज भी इतिहास की कई अहम यादों को अपने भीतर समेटे हुए है। यह वही ऐतिहासिक घर है, जहां पूर्व सांसद पूर्णचंद्र बिरुवा, जिन्हें पीसी बिरुवा के नाम से जाना जाता है, का जन्म हुआ था। उनका बचपन और प्रारंभिक जीवन इसी घर में बीता।

स्थानीय लोगों के अनुसार यह भवन केवल एक आवास नहीं, बल्कि कोल्हान की सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है।

मानकी परंपरा का रहा प्रभाव

बताया जाता है कि ब्रिटिश शासनकाल के दौरान पीसी बिरुवा के दादा कुरसो बिरुवा इलाके के प्रभावशाली मानकी थे। मानकी व्यवस्था के तहत वे अपने अधिकार क्षेत्र के कई गांवों का प्रशासनिक संचालन करते थे। कहा जाता है कि वे घोड़े पर सवार होकर अपने पीढ़ क्षेत्र का निरीक्षण करते थे और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी निभाते थे।

स्थानीय परंपराओं के अनुसार उस समय कोल्हान के प्रभावशाली मानकियों में कुरसो बिरुवा का महत्वपूर्ण स्थान था। इसी पारिवारिक विरासत का प्रभाव आगे चलकर पीसी बिरुवा के सार्वजनिक जीवन में भी देखने को मिला।

विरासत में मिली नेतृत्व की पहचान

स्थानीय लोगों का मानना है कि पीसी बिरुवा को नेतृत्व और जनसेवा की प्रेरणा अपने परिवार से मिली। ब्रिटिश काल में मानकी व्यवस्था स्थानीय शासन का महत्वपूर्ण हिस्सा थी और बिरुवा परिवार क्षेत्र के समृद्ध एवं प्रभावशाली परिवारों में गिना जाता था।

इसी सामाजिक और शैक्षणिक वातावरण का परिणाम था कि उस दौर में, जब उच्च शिक्षा प्राप्त करना बेहद कठिन माना जाता था, पीसी बिरुवा ने पटना जाकर स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उस समय ग्रामीण क्षेत्र के किसी युवक का राजधानी में उच्च शिक्षा प्राप्त करना बड़ी उपलब्धि माना जाता था।

लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाद बदली भूमिका

देश की आजादी और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था लागू होने के बाद पारंपरिक मानकी व्यवस्था की प्रशासनिक शक्तियां धीरे-धीरे सीमित होती चली गईं। हालांकि, बिरुवा परिवार की ऐतिहासिक विरासत और सामाजिक पहचान आज भी क्षेत्र के लोगों के बीच सम्मान के साथ याद की जाती है।

बड़ा लगड़ा गांव स्थित यह ऐतिहासिक भवन आज भी पीसी बिरुवा के जीवन और कोल्हान की समृद्ध परंपरा का महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जाता है।

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