रांची: राजधानी रांची में गुरुवार को ऐतिहासिक 335वीं जगन्नाथ रथयात्रा पूरे धार्मिक उत्साह और श्रद्धा के साथ निकाली गई। भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा मुख्य मंदिर से रथ पर विराजमान होकर भक्तों के बीच पहुंचे। इसके बाद करीब डेढ़ लाख श्रद्धालुओं ने रथ की डोर थामकर जय जगन्नाथ के गगनभेदी नारों के बीच लगभग दो घंटे में रथ को मुख्य मंदिर से मौसीबाड़ी तक पहुंचाया।
10 वर्षों में पहली बार रथयात्रा के दिन नहीं हुई बारिश
रथयात्रा के दौरान इस वर्ष बारिश नहीं हुई। धार्मिक मान्यता के अनुसार रथयात्रा के दिन वर्षा होना शुभ माना जाता है और इसे अच्छी खेती का संकेत माना जाता है। पिछले 10 वर्षों के रिकॉर्ड पर नजर डालें तो रथयात्रा के दिन लगभग हर साल हल्की से मध्यम बारिश हुई थी। वर्ष 2026 ऐसा पहला अवसर रहा, जब रांची में रथयात्रा के दिन बिल्कुल बारिश दर्ज नहीं हुई।
335 वर्षों से कायम है ऐतिहासिक परंपरा
रांची की जगन्नाथ रथयात्रा का इतिहास 335 वर्ष पुराना है। इसकी शुरुआत वर्ष 1691 में नागवंशी शासक अनिनाथ शाहदेव ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर से प्रेरित होकर की थी। जगन्नाथपुर मंदिर की स्थापत्य शैली और धार्मिक परंपराएं आज भी पुरी की परंपराओं का अनुसरण करती हैं।
इतिहास में केवल 2020 और 2021 में कोरोना महामारी के कारण रथयात्रा सार्वजनिक रूप से आयोजित नहीं हो सकी थी। उन वर्षों में मंदिर परिसर के भीतर ही पूजा-अर्चना संपन्न कराई गई थी।
सीएम हेमंत सोरेन ने तोरण द्वार निर्माण की घोषणा की
रथयात्रा में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी शामिल हुए। उन्होंने भगवान जगन्नाथ के रथ की रस्सी खींचकर यात्रा की शुरुआत की और श्रद्धालुओं को रथयात्रा की शुभकामनाएं दीं।
मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि जगन्नाथपुर मंदिर को जोड़ने वाली सड़क पर नयासराय रिंग रोड के पास एक भव्य तोरण द्वार का निर्माण कराया जाएगा, ताकि मंदिर की दूर से ही अलग पहचान बन सके। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में रथयात्रा महोत्सव को और अधिक भव्य स्वरूप दिया जाएगा।
राज्यपाल भी हुए शामिल
रथयात्रा में राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार भी शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान रथ से नीचे उतरते समय उनका संतुलन कुछ क्षण के लिए बिगड़ गया, लेकिन सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत सहारा देकर उन्हें सुरक्षित उतार लिया। इसके बाद मुख्यमंत्री और अन्य अतिथियों को भी सुरक्षित नीचे उतारा गया।
