डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने ओरांव समाज की पारंपरिक उत्तराधिकार व्यवस्था से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल किसी परंपरा का दावा कर देने मात्र से उसे कानूनी मान्यता नहीं मिल सकती। किसी भी पारंपरिक प्रथा को मान्यता दिलाने के लिए उसके लंबे समय से प्रचलित होने और व्यापक रूप से स्वीकार किए जाने के ठोस एवं विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक है।

गुमला की पुश्तैनी जमीन से जुड़ा था मामला

यह मामला झारखंड के गुमला जिले की पुश्तैनी जमीन से संबंधित था। विवाद इस बात को लेकर था कि क्या ओरांव समाज में कोई चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को ‘घर-दामाद’ बनाकर अपनी पुश्तैनी संपत्ति का वारिस बना सकता है। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस तरह की किसी मान्य परंपरा के समर्थन में पर्याप्त और विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए गए।

निकटतम पुरुष रिश्तेदार को मिलेगा उत्तराधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब किसी कथित प्रथा के अस्तित्व का भरोसेमंद प्रमाण उपलब्ध नहीं हो, तो संपत्ति का उत्तराधिकार समाज की स्थापित पारंपरिक व्यवस्था के अनुसार परिवार के निकटतम पुरुष रिश्तेदार को मिलेगा। इसी आधार पर अदालत ने ट्रायल कोर्ट, पहली अपीलीय अदालत और झारखंड हाई कोर्ट के पूर्व के फैसलों को निरस्त कर दिया।

परंपरा की कानूनी मान्यता के लिए तय किए मानक

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी सामाजिक या पारंपरिक प्रथा को कानूनी मान्यता तभी मिल सकती है, जब यह सिद्ध हो कि वह लंबे समय से लगातार प्रचलन में रही है, समुदाय में व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है और उसके समर्थन में ठोस साक्ष्य उपलब्ध हैं।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आदिवासी समुदायों में पारंपरिक उत्तराधिकार और संपत्ति अधिकार से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल साबित हो सकता है।


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