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    Home » एक करोड़ का इनामी नक्सली मिसिर बेसरा फिर सुरक्षा बलों को चकमा देकर फरार, सारंडा से कोल्हान तक बढ़ा मेगा ऑपरेशन
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    एक करोड़ का इनामी नक्सली मिसिर बेसरा फिर सुरक्षा बलों को चकमा देकर फरार, सारंडा से कोल्हान तक बढ़ा मेगा ऑपरेशन

    Lok ChetnaBy Lok ChetnaJune 26, 2026No Comments137 Views
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    रांची: झारखंड, बिहार और ओडिशा क्षेत्र का सबसे वांटेड और एक करोड़ रुपये का इनामी माओवादी कमांडर मिसिर बेसरा एक बार फिर सुरक्षा बलों की घेराबंदी तोड़ने में सफल रहा है। करीब 3000 जवानों द्वारा चलाए जा रहे बड़े अभियान के बावजूद वह सारंडा जंगल से निकलकर कोल्हान के जंगलों तक पहुंच गया है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार उसके साथ उसका करीबी सहयोगी अजय महतो भी मौजूद है। अब उसकी लोकेशन सारंडा के जराइकेला क्षेत्र से लगभग 40 किलोमीटर दूर कोल्हान के जंगलों में मिलने की सूचना है।

    3000 जवानों की घेराबंदी तोड़कर निकला

    पिछले महीने केंद्रीय सुरक्षा बलों और झारखंड जगुआर की संयुक्त कार्रवाई में मिसिर बेसरा और उसके साथियों को चाईबासा के सारंडा जंगल के जराइकेला, गोइलकेरा और बलिबा इलाके तक सीमित कर दिया गया था। हालांकि बलिबा के आगे घने जंगल और दुर्गम पहाड़ी इलाका होने के कारण लगातार अभियान चलाना चुनौतीपूर्ण रहा। इसी का फायदा उठाकर मिसिर बेसरा और उसके सहयोगियों ने छोटे-छोटे समूहों में लगातार ठिकाने बदले और अंततः घेराबंदी से बाहर निकलने में कामयाब हो गए।

    सारंडा से दलमा तक बढ़ाया गया अभियान

    नई खुफिया जानकारी मिलने के बाद सुरक्षा बलों ने अभियान का दायरा और बढ़ा दिया है। फिलहाल सारंडा से लेकर दलमा तक बड़े स्तर पर सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि नक्सलियों ने अब कोल्हान के ऊंचे पहाड़ी और घने जंगल वाले इलाकों में नया ठिकाना बना लिया है।

    ड्रोन निगरानी, ग्राउंड इंटेलिजेंस और कई जिलों की पुलिस के साथ केंद्रीय सुरक्षा बल संयुक्त रूप से अभियान चला रहे हैं। अप्रैल से झारखंड में नक्सलवाद के पूरी तरह सफाए के उद्देश्य से विशेष अभियान जारी है।

    पहले जैसी ताकत नहीं रही

    पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मिसिर बेसरा अब पहले जितना मजबूत नहीं रहा। उसके संगठन की कैडर शक्ति काफी कमजोर हो चुकी है और स्थानीय स्तर पर भी उसका प्रभाव पहले जैसा नहीं है। अधिकारियों का मानना है कि लगातार दबाव और रसद आपूर्ति बाधित होने के कारण उसके सामने आत्मसमर्पण ही सबसे व्यावहारिक विकल्प बचा है।

    पुलिस के अनुसार जिस इलाके में वह अब तक छिपा हुआ था, वहां बड़ी संख्या में विस्फोटक लगाए गए थे, जिससे अभियान चलाना जोखिम भरा था। अब खुले इलाके में आने के बाद उसकी गतिविधियों पर नजर रखना अपेक्षाकृत आसान होगा।

    कैसे तोड़ी सुरक्षा घेराबंदी?

    जानकारी के अनुसार सुरक्षा बल पूरे दस्ते की तलाश में जंगलों में कैंप लगाए हुए थे। लैंड माइंस की आशंका के कारण जवान रात में सीमित मूवमेंट कर रहे थे। इसी का फायदा उठाकर सबसे पहले मिसिर बेसरा केवल एक साथी के साथ वहां से निकला। इसके बाद उसके बाकी सहयोगी भी छोटे-छोटे समूहों में अलग-अलग रास्तों से नए ठिकानों तक पहुंच गए।

    तीन हिस्सों में बंट चुका है नक्सली नेटवर्क

    सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक सक्रिय नक्सली अब तीन अलग-अलग समूहों में काम कर रहे हैं।

    • पहला समूह मिसिर बेसरा का कोर ग्रुप है, जिसमें अजय महतो सहित कुछ हार्डकोर नक्सली शामिल हैं और इनकी मौजूदगी कोल्हान के जंगलों में बताई जा रही है।
    • दूसरा समूह 10 से 15 नक्सलियों का है, जो सारंडा-ओडिशा सीमा के जंगलों में छोटे समूहों में सक्रिय है।
    • तीसरा समूह करीब नौ नक्सलियों का है, जिनकी गतिविधियां पोड़ाहाट के जंगलों में होने की सूचना है।

    सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि लगातार घेराबंदी, लॉजिस्टिक सप्लाई बाधित होने और बड़े कैंप ध्वस्त किए जाने के कारण नक्सलियों को बार-बार अपना ठिकाना बदलना पड़ रहा है।

    एसपी अमित रेणु ने क्या कहा?

    एसपी अमित रेणु ने बताया कि अब सक्रिय नक्सलियों की संख्या काफी कम रह गई है। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन का दायरा बढ़ा दिया गया है और सारंडा के साथ-साथ कोल्हान के सानुआ क्षेत्र में भी व्यापक अभियान चलाया जा रहा है। उनका कहना है कि बारिश के मौसम में नक्सलियों की मुश्किलें और बढ़ेंगी तथा उनके सामने आत्मसमर्पण के अलावा कोई व्यवहारिक विकल्प नहीं बचेगा।

    बेटे की अपील भी नहीं मानी

    पुलिस सूत्रों के अनुसार झारखंड पुलिस ने मिसिर बेसरा के बेटे के माध्यम से उससे संपर्क कर आत्मसमर्पण की अपील कराई थी। बेटे ने बढ़ती उम्र और खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए मुख्यधारा में लौटने का आग्रह किया, लेकिन मिसिर बेसरा ने हथियार डालने से साफ इनकार कर दिया।

    गिरिडीह जिले के पीरटांड़ का रहने वाला मिसिर बेसरा 1980 और 1990 के दशक में एमसीसी संगठन से जुड़ा था। वर्ष 2007 में उसकी गिरफ्तारी हुई थी, लेकिन 2009 में चाईबासा कोर्ट ले जाते समय नक्सलियों ने विस्फोट कर उसे पुलिस हिरासत से छुड़ा लिया था। तब से वह सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल है।

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