रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने धनबाद की पाथरडीह कोल वाशरी के लिए करीब 66 वर्ष पहले अधिग्रहित की गई भूमि को मूल रैयतों के वारिसों को वापस लौटाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने इस मामले में दायर 13 वर्ष पुरानी याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि वर्ष 1960-61 में किया गया भूमि अधिग्रहण पूरी तरह वैध था और प्रभावित रैयतों को नियमानुसार मुआवजा भी दिया गया था।
1960-61 का भूमि अधिग्रहण वैध, चुनौती खारिज
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने अपने फैसले में कहा कि भूमि अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार पूरी की गई थी। ऐसे में कई दशक बाद अधिग्रहण की वैधता को चुनौती देने का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने स्वयं स्वीकार किया है कि भूमि का अधिग्रहण वर्ष 1960-61 में हुआ था और उसके एवज में मुआवजा भी दिया गया था।
रिकॉर्ड से मुआवजा और कानूनी प्रक्रिया की पुष्टि
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा-4 के तहत अधिसूचना जारी की गई थी। इसके बाद धारा-5ए के तहत आपत्तियां आमंत्रित की गईं और सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद अवार्ड पारित कर मुआवजा वितरित किया गया। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित रैयतों ने वर्ष 1963 में मुआवजा प्राप्त कर लिया था।
बीसीसीएल ने भी रखा अपना पक्ष
बीसीसीएल की ओर से अदालत को बताया गया कि विवादित भूमि किसी निजी कंपनी को हस्तांतरित नहीं की गई है। मोनेट इस्पात एंड एनर्जी लिमिटेड को केवल पाथरडीह कोल वाशरी के निर्माण, संचालन और रखरखाव का अनुबंध दिया गया था, जबकि भूमि का स्वामित्व आज भी बीसीसीएल के पास है।
लगान रसीद से नहीं साबित होता स्वामित्व
अदालत ने कहा कि केवल लगान रसीद के आधार पर किसी भूमि पर स्वामित्व का दावा नहीं किया जा सकता। साथ ही सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहित भूमि का उपयोग यदि किसी अन्य सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किया जाता है, तो उसे मूल रैयतों को वापस लौटाने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है।
गौरतलब है कि दीपक कुमार महतो एवं अन्य याचिकाकर्ताओं ने अपने पूर्वजों की कृषि भूमि वापस करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया।
अदालत की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इतने लंबे समय बाद भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को चुनौती देना न्यायसंगत नहीं है। चूंकि अधिग्रहण विधिसम्मत तरीके से हुआ था और मुआवजा भी दिया जा चुका था, इसलिए भूमि वापस करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।

