रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने रांची जिले से जुड़े करीब आठ दशक पुराने सीएनटी भूमि विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 19 वर्ष बाद दोबारा शुरू की गई एसएआर कार्यवाही को अवैध करार दिया है। न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने स्पष्ट कहा कि जिस मामले का पहले ही विधिवत निपटारा हो चुका हो और उसका आदेश अंतिम रूप ले चुका हो, उसे लंबे अंतराल के बाद दोबारा नहीं खोला जा सकता।
अदालत ने 28 जून 2008 को अतिरिक्त समाहर्ता द्वारा पारित आदेश तथा 21 अक्टूबर 2008 को प्रमंडलीय आयुक्त के पुनरीक्षण आदेश को निरस्त करते हुए 26 अगस्त 1988 को एसएआर अधिकारी द्वारा पारित आदेश को पूरी तरह वैध माना। इसके साथ ही याचिकाकर्ता अमर कुमार चौधरी की रिट याचिका स्वीकार कर ली गई।
1988 का आदेश माना गया अंतिम और वैध
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि वर्ष 1988 में पारित एसएआर अधिकारी के आदेश के खिलाफ उस समय किसी भी न्यायालय में कोई कानूनी चुनौती नहीं दी गई थी। आदेश के अनुपालन में सितंबर 1988 में पंजीकृत बिक्री विलेख निष्पादित हुआ और संबंधित भूमि का नामांतरण भी कर दिया गया था।
अदालत ने कहा कि जब कोई आदेश अंतिम रूप ले चुका हो, तब लगभग 19 वर्ष बाद उसी मामले में नई एसएआर कार्यवाही शुरू करना कानून की दृष्टि से उचित नहीं है। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि 40 से 50 वर्ष पुराने मामलों को दोबारा खोलना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
क्या है पूरा मामला
मामला रांची जिले के चान्हो स्थित खाता संख्या 41, प्लॉट संख्या 610 की 1.32 एकड़ भूमि से जुड़ा है। याचिकाकर्ता अमर कुमार चौधरी के अनुसार उनके पिता ने वर्ष 1947 में तत्कालीन रैयत कुसल कुजूर एवं अन्य लोगों से यह भूमि 2,500 रुपये में खरीदी थी। हालांकि सक्षम प्राधिकारी की अनुमति नहीं मिलने के कारण बिक्री की औपचारिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी, लेकिन परिवार का भूमि पर लगातार कब्जा बना रहा।
वर्ष 1962 में भूमि को लेकर विवाद उत्पन्न होने पर टाइटल सूट दायर किया गया, जिसका वर्ष 1965 में समझौते के आधार पर निपटारा हो गया। इसके बाद वर्ष 1986-87 में पहली बार एसएआर मामला दर्ज हुआ।
2006 में दोबारा शुरू हुई थी एसएआर कार्यवाही
26 अगस्त 1988 को एसएआर अधिकारी ने आदेश दिया था कि याचिकाकर्ता के पिता समान क्षेत्रफल की दूसरी भूमि प्रतिवादी के पक्ष में हस्तांतरित करें। इस आदेश का पालन करते हुए सितंबर 1988 में पंजीकृत बिक्री विलेख तैयार किया गया और नामांतरण भी कर दिया गया।
इसके बावजूद वर्ष 2006 में प्रतिवादी पक्ष ने दोबारा एसएआर मामला दायर किया। एसएआर अधिकारी ने इसे पहले से निष्पादित मामला मानते हुए खारिज कर दिया था। बाद में अतिरिक्त समाहर्ता ने अपील स्वीकार करते हुए वर्ष 2007 के आदेश के साथ-साथ वर्ष 1988 के मूल आदेश को भी रद्द कर दिया। इसके बाद प्रमंडलीय आयुक्त ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।
इन दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए अमर कुमार चौधरी ने झारखंड हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अब 1988 के मूल आदेश को वैध ठहराते हुए बाद की पूरी एसएआर कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

