रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने राजधानी रांची के मोरहाबादी स्थित विवादित जमीन से जुड़े 23 वर्ष पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए डॉ. एच.पी. नारायण और उनकी पत्नी वीणा नारायण की ओर से दायर दोनों रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे कि विवादित जमीन छप्परबंदी श्रेणी की थी। ऐसे में सीएनटी एक्ट की धारा 71ए के तहत भूमि बहाली का आदेश पूरी तरह वैध है।
यह फैसला जस्टिस अनुभा रावत चौधरी की एकलपीठ ने सुनाया। अदालत ने यह भी माना कि भूमि बहाली की याचिका समय-सीमा के भीतर दायर की गई थी और इसे विलंब के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
भूमि बहाली का आदेश रहेगा प्रभावी
अदालत ने कहा कि प्रतिवादी कुआरी टोप्पो और उनके परिवार को वर्ष 1976 से 1980 के बीच जमीन से बेदखल किया गया था। इसके बाद वर्ष 1983 में भूमि बहाली के लिए आवेदन दायर किया गया, जो समयबद्ध माना गया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि कई अवसर दिए जाने के बावजूद याचिकाकर्ता ऐसा कोई खतियान या रिकॉर्ड ऑफ राइट्स प्रस्तुत नहीं कर सके, जिससे यह सिद्ध हो सके कि विवादित जमीन छप्परबंदी थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल एक-दो लगान रसीदों या अंचल अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर किसी भूमि का स्वरूप नहीं बदला जा सकता।
एसएआर कोर्ट और प्रशासनिक आदेशों पर हाईकोर्ट की मुहर
हाईकोर्ट ने माना कि एसएआर कोर्ट, उपायुक्त और प्रमंडलीय आयुक्त द्वारा पारित आदेश पूरी तरह विधिसम्मत हैं। इनमें किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई। इसलिए अदालत ने हस्तक्षेप से इनकार करते हुए दोनों रिट याचिकाएं खारिज कर दीं और आदिवासी रैयत के पक्ष में भूमि बहाली के आदेश को बरकरार रखा।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला रांची के मोरहाबादी स्थित खाता संख्या-77, प्लॉट संख्या-1123 की 1.22 एकड़ जमीन से जुड़ा है।
याचिकाकर्ताओं का दावा था कि मूल रैयत ने वर्ष 1943 में यह जमीन तत्कालीन जमींदार को समर्पित कर दी थी। इसके बाद जमींदार ने शेख रहमान अली के पक्ष में सादा हुकूमनामा के जरिए छप्परबंदी बंदोबस्ती की थी। वर्ष 1979 में पंजीकृत बिक्री विलेख के आधार पर उन्होंने यह जमीन खरीदी और उनके नाम पर म्यूटेशन तथा लगान रसीद भी जारी हुई।
वहीं, प्रतिवादी कुआरी टोप्पो ने अदालत को बताया कि विवादित जमीन उनके ससुर हरिहर उरांव ने 9 दिसंबर 1940 को रजिस्ट्री डीड के माध्यम से खरीदी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके पति बैजनाथ उरांव की मानसिक स्थिति का लाभ उठाकर वर्ष 1976 से 1980 के बीच जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया गया था। इसी आधार पर उन्होंने भूमि बहाली की मांग की थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने भी वैध माना है।

