रांची : झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने राज्य से बाहर कार्यरत प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा, कल्याण और आपातकालीन परिस्थितियों में सहायता व्यवस्था को लेकर झारखंड सरकार के श्रम विभाग से जवाब मांगा है। उन्होंने श्रमायुक्त को पत्र लिखकर प्रवासी श्रमिकों के लिए एक प्रभावी और सशक्त सहायता तंत्र विकसित करने का आग्रह किया है।
6 जून 2026 को लिखे गए पत्र में अर्जुन मुंडा ने कहा है कि हाल के दिनों में झारखंड के दो प्रवासी श्रमिकों की असामयिक मृत्यु ने राज्य से बाहर काम कर रहे लाखों श्रमिकों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दो श्रमिकों की मौत का किया उल्लेख
अर्जुन मुंडा ने अपने पत्र में खरसावां प्रखंड के हलुदबनी निवासी विशाल महतो और बहरागोड़ा के आसनबनी निवासी कार्तिक मुंडा के मामलों का उल्लेख किया है। उन्होंने बताया कि विशाल महतो कर्नाटक के बेंगलुरु में एक निजी कंपनी में कार्यरत थे और झारखंड लौटने के दौरान आंध्र प्रदेश के तिरुपति में ट्रेन यात्रा के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ने से मृत्यु हो गई थी।
इसी प्रकार आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में कार्यरत कार्तिक मुंडा की भी असामयिक मौत हो गई। दोनों मामलों में परिजनों को पार्थिव शरीर को झारखंड लाने के लिए काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
शव लाने में परिजनों को हुई भारी परेशानी
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि दोनों परिवारों ने सहायता के लिए उनके कार्यालय से संपर्क किया था। इसके बाद संबंधित राज्यों के प्रशासनिक अधिकारियों और जिला प्रशासन से समन्वय स्थापित कर पार्थिव शरीर को झारखंड लाया जा सका।
उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि राज्य से बाहर कार्यरत श्रमिकों के लिए वर्तमान सहायता तंत्र पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं है और इसमें सुधार की आवश्यकता है।
डिजिटल डेटाबेस की उपलब्धता पर मांगी जानकारी
अर्जुन मुंडा ने श्रम विभाग से पूछा है कि क्या राज्य सरकार के पास प्रवासी श्रमिकों का कोई अद्यतन और केंद्रीकृत डिजिटल डेटाबेस उपलब्ध है। उन्होंने जानना चाहा कि राज्य के कितने श्रमिक अन्य राज्यों में कार्यरत हैं, वे किन कंपनियों या प्रतिष्ठानों में काम कर रहे हैं और आपातकालीन स्थिति में उनसे संपर्क स्थापित करने की क्या व्यवस्था है।
उन्होंने कहा कि यदि श्रमिकों का समुचित और अद्यतन रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होगा तो दुर्घटना, बीमारी, मृत्यु या अन्य संकट की स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराना कठिन हो जाएगा।
हेल्पलाइन व्यवस्था पर भी उठाए सवाल
पूर्व मुख्यमंत्री ने पत्र में यह भी पूछा है कि क्या प्रवासी श्रमिकों और उनके परिवारों की सहायता के लिए कोई टोल-फ्री हेल्पलाइन अथवा 24 घंटे संचालित आपातकालीन सहायता केंद्र मौजूद है।
उन्होंने कहा कि प्रभावी हेल्पलाइन व्यवस्था के अभाव में श्रमिक और उनके परिजन समय पर अपनी समस्याएं संबंधित विभाग तक नहीं पहुंचा पाते हैं, जिससे संकट की घड़ी में उन्हें अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
24×7 हेल्पलाइन और अनिवार्य पंजीकरण की मांग
अर्जुन मुंडा ने सुझाव दिया कि राज्य सरकार प्रवासी श्रमिकों के लिए अनिवार्य पंजीकरण व्यवस्था लागू करे। पंचायत स्तर तक पंजीकरण की सुविधा उपलब्ध कराते हुए एक केंद्रीकृत डिजिटल डेटाबेस तैयार किया जाए।
इसके साथ ही श्रमिकों और उनके परिवारों की सहायता के लिए 24×7 संचालित टोल-फ्री हेल्पलाइन स्थापित करने की दिशा में आवश्यक कदम उठाए जाएं, ताकि किसी भी आपात स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराई जा सके।
श्रमिकों की सुरक्षा को बताया नैतिक जिम्मेदारी
अर्जुन मुंडा ने कहा कि प्रवासी श्रमिक राज्य की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। संकट की घड़ी में उनकी सुरक्षा, सम्मान और सहायता सुनिश्चित करना केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं बल्कि सरकार और समाज की नैतिक जिम्मेदारी भी है।
उन्होंने श्रम विभाग से वर्तमान व्यवस्था, उपलब्ध आंकड़ों और भविष्य की कार्ययोजना की जानकारी साझा करने का भी आग्रह किया है।

