जमशेदपुर: झारखंड के बहरागोड़ा थाना क्षेत्र में स्वर्णरेखा नदी किनारे मिले द्वितीय विश्व युद्ध काल के दो खतरनाक अमेरिकी बमों को आखिरकार सेना ने सफलतापूर्वक निष्क्रिय कर दिया। इन बमों का वजन करीब 227-227 किलो था और हैरानी की बात यह रही कि करीब 80 साल तक रेत में दबे रहने के बावजूद ये पूरी तरह सक्रिय थे।
कंट्रोल्ड ब्लास्ट से किया गया निष्क्रिय
सेना की विशेष बम निरोधक टीम ने नियंत्रित विस्फोट के जरिए इन बमों को डिफ्यूज किया। इस दौरान तेज धमाके की आवाज से आसपास के इलाके में कंपन महसूस किया गया। ग्रामीणों के अनुसार धमाका इतना तेज था कि कुछ पल के लिए जमीन हिलती हुई महसूस हुई।
पूरे इलाके को किया गया खाली
सुरक्षा के मद्देनजर प्रशासन ने पहले ही आसपास के घरों को खाली करा लिया था और इलाके को पूरी तरह सील कर दिया गया था। पुलिस बल और सुरक्षा एजेंसियों की तैनाती के साथ पूरे क्षेत्र को छावनी में तब्दील कर दिया गया था।
खुदाई के दौरान मिला था बम
यह बम पानीपड़ा-नागसुड़ाई इलाके में बालू खनन के दौरान मिला था। 7 मार्च को मजदूरों को खुदाई के दौरान पहला बम दिखाई दिया, जिसके बाद प्रशासन को सूचना दी गई। जांच में इन पर ‘एएन-एम64’ और ‘मेड इन यूएसए’ अंकित पाया गया, जिससे इनके द्वितीय विश्व युद्ध काल के होने की पुष्टि हुई।
कैसे किए गए डिफ्यूज
बमों को निष्क्रिय करने के लिए नदी किनारे गहरा गड्ढा खोदकर उन्हें उसमें रखा गया और ऊपर से सैकड़ों मिट्टी की बोरियों से ढक दिया गया। इसके बाद नियंत्रित विस्फोट कर उन्हें सुरक्षित तरीके से नष्ट किया गया।
80 साल बाद भी क्यों थे सक्रिय
विशेषज्ञों के अनुसार, ये बम रेत और कीचड़ में दबे रहने के कारण ऑक्सीजन के संपर्क में नहीं आए, जिससे इनमें जंग या रासायनिक क्षति कम हुई। यही वजह है कि इतने वर्षों बाद भी ये निष्क्रिय नहीं हुए और खतरनाक बने रहे।
सुरक्षा और खनन पर उठे सवाल
इस घटना के बाद अवैध बालू खनन और सुरक्षा मानकों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। समय रहते बमों का पता चलने से एक बड़े हादसे को टाल दिया गया।
