रांची: झारखंड का सिनेमा अब केवल बाहरी फिल्मकारों की नजर से नहीं, बल्कि अपनी भाषाओं, संस्कृति और समाज के दृष्टिकोण से भी नई पहचान बना रहा है। विशेष रूप से आदिवासी और जनजातीय सिनेमा ने राज्य की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया है। आज झारखंडी फिल्मकार अपनी मातृभाषाओं में कहानियां गढ़ते हुए वैश्विक स्तर पर पहचान बना रहे हैं।
विनोद कुमार ने रखी झारखंडी सिनेमा की मजबूत नींव
रांची के वरिष्ठ फिल्मकार विनोद कुमार उन शुरुआती निर्देशकों में शामिल हैं जिन्होंने स्थानीय आदिवासी समाज और संस्कृति को केंद्र में रखकर फीचर फिल्म निर्माण का साहस किया। उनकी फिल्म ‘अक्रांत’ (1988) दूरदर्शन पर प्रसारित हुई और मुंबई फिल्म पैनोरमा में भी शामिल होकर व्यापक पहचान हासिल की।
बुसान से लेकर राष्ट्रीय पुरस्कार तक झारखंड की चमक
युवा निर्देशक निरंजन कुजूर की फिल्म ‘दुई जागर’ वर्ष 2024 में बुसान अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के प्रतिष्ठित न्यू करंट्स खंड के लिए चयनित हुई। इसके बाद 2025 में इसका भारतीय प्रीमियर मामी मुंबई फिल्म फेस्टिवल में हुआ।
वहीं, संताली फिल्मकार रवि राज मुर्मू ने संताली भाषा के सिनेमा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाते हुए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल किया। रांची के नीरज शुक्ला ने बॉलीवुड फिल्म ‘रईस’ की पटकथा लिखकर झारखंड का नाम रोशन किया।
सामाजिक सरोकारों को पर्दे पर लाने वाले फिल्मकार
रांची के अभिनेता राजेश जैश ने फिल्मों और वेब सीरीज में अपनी अलग पहचान बनाई है। निर्देशक सतीश मुंडा ने अपनी डॉक्यूमेंट्री ‘दृष्टि’ और यूरेनियम खनन पर आधारित चर्चित फिल्म ‘जादूगोड़ा’ के जरिए सामाजिक मुद्दों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी फीचर फिल्म ‘चक्की’ वर्ष 2022 में रिलीज हुई थी।
नई पीढ़ी के फिल्मकारों ने बढ़ाया झारखंड का मान
सिमडेगा के लेखक-निर्देशक एनपीके पुरुषोत्तम की लघु फिल्म ‘बंधा खेत’ कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराही गई। वहीं, नागपुरी फिल्म ‘सेरेंग’ की व्यावसायिक सफलता ने साबित किया कि क्षेत्रीय भाषाओं का सिनेमा भी दर्शकों के बीच मजबूत पहचान बना सकता है।
कुड़ुख सिनेमा और झारखंडी संगीत के क्षेत्र में सुरेंद्र कुजूर पिछले दो दशकों से सक्रिय हैं। वर्ष 2025 के गणतंत्र दिवस समारोह में उनकी संगीत निर्देशन वाली झारखंड की झांकी को देश की सर्वश्रेष्ठ झांकी का सम्मान मिला।
कान्स तक पहुंची झारखंड की प्रतिभा
पलामू के युवा फिल्म निर्देशक प्रवीण तिवारी ने रिलीज से पहले ही अपनी फिल्मों के लिए 21 पुरस्कार हासिल कर नई पीढ़ी के फिल्मकारों में अलग पहचान बनाई है।
वहीं, लोहरदगा के लाल विजय शाहदेव की फिल्म ‘द साइलेंट स्टैच्यू’ वर्ष 2016 में कान्स फिल्म फेस्टिवल के शॉर्ट फिल्म कॉर्नर में प्रदर्शित हुई। उन्होंने ‘लोहरदगा’ और ‘फुलमनिया’ जैसी चर्चित फिल्मों का निर्देशन किया। इसके अलावा रांची के अनुज कुमार ने कथा और वृत्तचित्र दोनों विधाओं में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
आज झारखंड का सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि राज्य की संस्कृति, भाषा, परंपरा और सामाजिक सरोकारों की सशक्त अभिव्यक्ति बनकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी पहचान स्थापित कर रहा है।

