नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने ओरांव आदिवासी समुदाय की पारंपरिक उत्तराधिकार व्यवस्था से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि मान्यता प्राप्त पारंपरिक कानून के तहत कोई चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को ‘घर-दामाद’ के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी किसी प्रथा का कोई वैध प्रमाण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए झारखंड हाईकोर्ट समेत निचली अदालतों के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें चाचा-ससुर द्वारा घर-दामाद रखने की व्यवस्था को वैध माना गया था।
पैतृक संपत्ति के अधिकार को लेकर था विवाद
मामला सुखू ओरांव की पैतृक संपत्ति से जुड़ा था। उनके तीन पुत्र थे—घुंगरू, लेदुरा और भौला। लेदुरा की मृत्यु बिना संतान के हुई, जबकि भौला के निधन के समय उनकी एक पुत्री बुधैन जीवित थीं।
वादी बेजला ओरांव, जो घुंगरू के पुत्र हैं, ने दावा किया कि लेदुरा और भौला की मृत्यु के बाद सबसे निकट पुरुष रिश्तेदार होने के कारण पैतृक संपत्ति पर उनका वैध अधिकार बनता है।
वहीं प्रतिवादी पक्ष का कहना था कि बुधैन के पति पुनाई को लेदुरा ने घर-दामाद के रूप में स्वीकार किया था, इसलिए संपत्ति पर उनका अधिकार है।
पारंपरिक प्रथा साबित नहीं कर सके प्रतिवादी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी यह साबित करने में असफल रहे कि कथित घर-दामाद की व्यवस्था ओरांव समुदाय की मान्यता प्राप्त पारंपरिक प्रथा के अनुरूप थी। अदालत ने माना कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जिससे यह सिद्ध हो सके कि चाचा-ससुर को अपनी भतीजी के पति को घर-दामाद बनाने का अधिकार प्राप्त है।
निचली अदालतों के फैसले हुए निरस्त
इससे पहले ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादियों की दलील स्वीकार करते हुए वाद खारिज कर दिया था। प्रथम अपीलीय अदालत ने भी उस निर्णय को बरकरार रखा और बाद में झारखंड हाईकोर्ट ने दूसरी अपील भी खारिज कर दी थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न तय किया था कि क्या ओरांव समुदाय के पारंपरिक कानून के तहत चाचा-ससुर घर-दामाद रख सकता है। इसके बाद वादी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
वादी के पक्ष में आया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने वादी के तर्कों को स्वीकार करते हुए कहा कि उपलब्ध पारंपरिक कानून और साक्ष्यों के आधार पर चाचा-ससुर द्वारा घर-दामाद रखने की व्यवस्था को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर निचली अदालतों और झारखंड हाईकोर्ट के फैसलों को निरस्त कर दिया गया।

